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तुम कैसी हो (कविता)


कुछ सपने बातों से टूटे, कुछ अपने हाथों से छूटे,
बची कुची इस वर्तमान में तुम कैसी हो
शब्दों के जब पर होते थे, अक्षर के भी स्वर होते थे,
सारे खत अब पीले पीले पड़ गए, तुम कैसी हो
दुनियादारी समझ कहां थी, नादानी कि अलग मज़ा थी,
सोच समझ की अनुभव मे अब तुम कैसी हो
चलते थे हम जिन राह में, कहां है जाना क्या ख़बर थी,
पहुँच चुकी इस गंतव्य में तुम कैसी हो
पल में सदियाँ होजाति थी, बात पूरी ना हो पाति थी,
फ़ुर्सत कि इस जीवनकाल में तुम कैसी हो
मोम के थे जज़्बात जो सारे, धीमि आंच मे गल जाति थी,
जीवन की झूलसी राह मे तुम कैसी हो
तुम कैसी हो, तुम कैसी हो
तुम जैसी थी क्या वैसी हो

खतम होंति जब जिम्मेदारी, सूरज गगन मे ढल जाते हैं

उम्मीदो के गीत सुनाते सारे पंछी लौट आते हैं
फिर होता एक नया सवेरा, नई आशा कि ज्योत जलाति
फिर चलता ये नियमित जीवन कहीं सम्भलति कहीं ठहरति
इसी बीच ये जिन्दगानी, रोज़ नई एक पाठ सीखाति
जो मिल गया वही तुम्हारा, जो छुटा वो और वजह थी
संसार के इस पटभूमि पर, जो भी रिश्ते खो जाते है
जीवन के वो किसी मोड़ पर, नाम बदलकर लौट आते है
फिर देता दस्तक इस दिल पर, वही पुरानी आदत थी जो
काफी अर्सा बीत चुका है, तुम कैसी हो, तुम कैसी हो

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